२०१७ के विधान सभा चुनाव भाजपा के पैर उखाड़ देंगे

किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कोई पार्टी कितने सीटों पर चुनाव लड़ती है, ये उसकी आंतरिक सोच और कार्यकर्ताओं की मनोदशा का परिचायक होता है , पिछले कुछ चुनावों में भाजपा ने जिस तरह से अधिकतम सीटों पर चुनाव लड़ा तो ये स्पष्ट था कि  उन्हे लगने लगा की देश की जनता भी नरेंद्र मोदी के वश में आ चुकी है बिलकुल उसी तरह जैसे भाजपा के तमाम नेताओं को प्राइम मिनिस्टर मोदी में किसी हिन्दू देवता की छवि नजर आती है वैसे ही देश की जनता खास क्र के हिन्दू लोगों को मोदी जी में देवता नजर आएंगे परंतु तमाम कोशिशों के बाद भी भाजपा बिलकुल उखड़ने के कगार पर आ गयी है।  Election UP 2017iElection 2017

अभी तो शायद हार का ठीकरा नोटबंदी पर डालने की तयारी पूरी तरह से हो चुकी होगी , पर सच्चाई ये है की भाजपा को समझना होगा की २०१४ में लोकसभा की जीत  सिर्फ प्रोपेगंडा और नरेंद्र मोदी और उनके साथियों के द्वारा लगातार किये गए झूठे वादों के कारण  मिली थी और उसमे अवतार अथवा चमत्कारिक पुरुष वाली कोई बात नहीं थी. २०१४ के लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है। हरियाणा , महाराष्ट्र और झारखण्ड चुनाव के बाद किसी भी चुनाव में भाजपा रंग में नहीं दिखी।  २०१५ में दिल्ली में ७० में  से ३  सीट पर जीत  , उसके बाद बिहार में विधान सभा में तीसरा स्थान, ये कोई अच्छी बात नहीं , क्योंकि इन सभी जगहों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , अमित शाह और उनके विश्वसनीय नेताओं ने जम क्र प्रचार किया था।  वर्ष २०१६ तो भाजपा के लिए बहुत ही बेकार गया – पशिम बंगाल, तमिल नाडु , पुड्डुचेरी और केरल में कुल ६९६ सीट पर भाजपा ने अपने कैंडिडेट उत्तर और उसे सिर्फ ६४ सीटों पर या यु कहें की सिर्फ ९ प्रतिशत सीटों पर सफलता मिली , प्रधानमंत्री मोदी ने अपना चमत्कार इन चुनावों में भी दिखाने  की कोशिश की थी पर वो फ्लॉप साबित हुए। Modi Monetization

इस बार के चुनावों में भाजपा को तीन खतरों से निपटना होगा –  

  • पहला खतरा नोटबंदी के कुप्रभावों का है जिसके कारण दैनिक मजदूरों , छोटे व्यापारियों और खेतिहरों को काफी कुछ झेलना पड़ा है और वो भाजपा को सबक सीखाने के पूरे मूड में हैंNarendra Modi Goa Election 2017
  • दूसरा फैक्टर केंद्रीय सरकार की एंटी इंकमबेंसी का है ; आज लोग प्रधानमंत्री मोदी को एक पर्यटन करने वाले और जनता की सब्सिडी में कटौती करने वाले प्रधानमंत्री के रूप में जानते हैं और ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार की उपलब्धियों को गिनाना जनता के गुस्से में आग में घी की तरह काम करेगी
  • तीसरा और प्रमुख खतरा पिछले कूछ सालों में भाजपा की नीतिगत परिवर्तन में है और ये परिवर्तन है स्वतंत्र छवि वाले नेताओं को दरकिनार करने की भाजपा ने दिल्ली विधान सभा चुनावों में डॉक्टर हर्षवर्धन को , बिहार विधान सभा में शत्रुघ्न सिन्हा को और अब पंजाब में नवजोत सिंह सिधु को दरकिनार किया है।  नवजोत सिधु ने तो कोन्ग्रेस्स का दमन भी थाम लिया है , अब देखना है की दरकिनार करने की नीति भाजपा को कितने गहरे खड्ड में डालती है।

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